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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
व्राह्मणाः क्षत्रिय़ा वैश्या न शिष्यन्ति जनाधिप |  ४१   क
एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षय़े ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति