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उद्योग पर्व
अध्याय ४३
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सनत्सुजात उवाच
श्रेय़ांस्तु षड्विधस्त्यागः प्रिय़ं प्राप्य न हृष्यति |  १८   क
अप्रिय़े तु समुत्पन्ने व्यथां जातु न चार्च्छति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति