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अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
उवाच चैनं मधुरं ततः शान्तनवो नृपः |  ५   क
प्रविशस्व पुरं राजन्व्येतु ते मानसो ज्वरः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति