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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
स शल्यमाभाष्य जगाद वाक्यं; पार्थस्य कर्माप्रतिमं च दृष्ट्वा |  ४१   क
मानेन दर्पेण च दह्यमानः; क्रोधेन दीप्यन्निव निःश्वसित्वा ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति