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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
नाहं महेन्द्रादपि वज्रपाणेः; क्रुद्धाद्विभेम्यात्तधनू रथस्थः |  ४२   क
दृष्ट्वा तु भीष्मप्रमुखाञ्शय़ाना; न्न त्वेव मां स्थिरता सञ्जहाति ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति