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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
नेह ध्रुवं किञ्चिदपि प्रचिन्त्यं; विदुर्लोके कर्मणोऽनित्ययोगात् |  ४७   क
सूर्योदय़े को हि विमुक्तसंशय़ो; गर्वं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति