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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
तस्मात्क्षिप्रं मद्रपते प्रय़ाहि; रणे पाञ्चालान्पाण्डवान्सृञ्जय़ांश्च |  ५२   क
तान्वा हनिष्यामि समेत्य सङ्ख्ये; यास्यामि वा द्रोणमुखाय़ मन्ये ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति