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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
वैय़ाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं; हैमत्रिकोशं रजतत्रिवेणुम् |  ५६   क
रथप्रवर्हं तुरगप्रवर्है; र्युक्तं प्रादान्मह्यमिदं हि रामः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति