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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
असुरसुरमहोरगान्नरा; न्गरुडपिशाचसय़क्षराक्षसान् |  ६५   क
इषुभिरजय़दग्निगौरवा; त्स्वभिलषितं च हविर्ददौ जय़ः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति