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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
समुदितवलवाहनाः पुनः; पुरुषवरेण जिताः स्थ गोग्रहे |  ६८   क
सगुरुगुरुसुताः सभीष्मकाः; किमु न जितः स तदा त्वय़ार्जुनः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति