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उद्योग पर्व
अध्याय १७
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शल्य उवाच
दिष्ट्या च नहुषो भ्रष्टो देवराज्यात्पुरन्दर |  ३   क
दिष्ट्या हतारिं पश्यामि भवन्तं वलसूदन ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति