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कर्ण पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ात्प्रीतिमान्वै रथेन; वैय़ाघ्रेण श्वेतय़ुजाथ कर्णः |  ७४   क
स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां; धनञ्जय़ं त्वरय़ा पर्यपृच्छत् ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति