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शल्य पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
तव हत्वा वलं सर्वं सङ्ग्रामे धृतराष्ट्रजः |  ११   क
जितान्पाण्डुसुतान्मत्वा रूपं धारय़ते महत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति