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शल्य पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
निहतं स्ववलं दृष्ट्वा पीडितं चापि पाण्डवैः |  १२   क
ध्रुवमेष्यति सङ्ग्रामे वधाय़ैवात्मनो नृपः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति