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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
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वैशम्पाय़न उवाच
शान्त्यर्थं सर्वय़ोधानामभ्यगच्छत पाण्डवम् |  २३   क
सा धनञ्जय़मासाद्य मुमोचार्तस्वरं तदा |  २३   ख
धनञ्जय़ोऽपि तां दृष्ट्वा धनुर्विससृजे प्रभुः ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति