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विराट पर्व
अध्याय ४४
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कृप उवाच
अथ वा कुञ्जरं मत्तमेक एव चरन्वने |  १३   क
अनङ्कुशं समारुह्य नगरं गन्तुमिच्छसि ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति