कर्ण पर्व  अध्याय ६७

सञ्जय़ उवाच

राज्यलुव्धः पुनः कर्ण समाह्वय़सि पाण्डवम् |  ५   क
गान्धारराजमाश्रित्य क्व ते धर्मस्तदा गतः ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति