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शल्य पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
भीमस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रं तव जनाधिप |  ४७   क
सुदर्शनमदृश्यं तं शरैश्चक्रे हसन्निव ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति