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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
पितामहं रणे हत्वा मन्यसे धर्ममात्मनः |  ३८   क
मय़ा शत्रौ हते कस्मात्पापे धर्मं न मन्यसे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति