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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
तपसाधिगतं चान्नं प्रजार्थं मे पितामह |  २५   क
ओषध्यः परिवर्तेरन्यथैव सततं प्रजाः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति