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शान्ति पर्व
अध्याय २६०
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भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तय़िष्यामि प्रामाण्यमुभय़ोस्तय़ोः |  ४   क
शृणुष्वैकमनाः पार्थ छिन्नधर्मार्थसंशय़म् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति