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आदि पर्व
अध्याय १८७
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वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यान्वा गुणसम्पन्नानुत वा शूद्रय़ोनिजान् |  ३   क
माय़ामास्थाय़ वा सिद्धांश्चरतः सर्वतोदिशम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति