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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वासुदेव उवाच
यावद्धि प्रथते लोके पुरुषस्य यशो भुवि |  ३२   क
तावत्तस्याक्षय़ं स्थानं भवतीति विनिश्चितम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति