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वन पर्व
अध्याय २६०
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मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रप्रभृतय़श्चैव सर्वे ते सुरसत्तमाः |  ११   क
वानरर्क्षवरस्त्रीषु जनय़ामासुरात्मजान् |  ११   ख
तेऽन्ववर्तन्पितॄन्सर्वे यशसा च वलेन च ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति