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वन पर्व
अध्याय २६०
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अग्निरु उवाच
स वाधते प्रजाः सर्वा विप्रकारैर्महावलः |  ३   क
ततो नस्त्रातु भगवन्नान्यस्त्राता हि विद्यते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति