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वन पर्व
अध्याय २२३
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द्रौपद्यु उवाच
तस्मादपत्यं विविधाश्च भोगाः; शय़्यासनान्यद्भुतदर्शनानि |  ३   क
वस्त्राणि माल्यानि तथैव गन्धाः; स्वर्गश्च लोको विषमा च कीर्तिः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति