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शान्ति पर्व
अध्याय २६१
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कपिल उवाच
नाक्रोशमर्छेन्न मृषा वदेच्च; न पैशुनं जनवादं च कुर्यात् |  २४   क
सत्यव्रतो मितभाषोऽप्रमत्त; स्तथास्य वाग्द्वारमथो सुगुप्तम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति