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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
कच्चिद्द्वौ प्रथमौ यामौ रात्र्यां सुप्त्वा विशां पते |  ७५   क
सञ्चिन्तय़सि धर्मार्थौ याम उत्थाय़ पश्चिमे ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति