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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
दीप्यमानं श्रिय़ा वीरं शक्रादनवमं वले |  १०   क
पारगं सर्वधर्माणां वृहस्पतिसमं मतौ ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति