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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वानुरक्तप्रकृतिं सर्वविद्याविशारदम् |  ११   क
जितेन्द्रिय़ममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति