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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
चिन्तय़ंश्च महातेजा गुणान्रामस्य वीर्यवान् |  १४   क
अभ्यभाषत भद्रं ते प्रीय़माणः पुरोहितम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति