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सभा पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
अजिनैः संवृतान्दृष्ट्वा हृतराज्यानरिन्दमान् |  २   क
प्रस्थितान्वनवासाय़ ततो दुःशासनोऽव्रवीत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति