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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अद्य पुष्यो निशि व्रह्मन्पुण्यं योगमुपैष्यति |  १५   क
सम्भाराः सम्भ्रिय़न्तां मे रामश्चोपनिमन्त्र्यताम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति