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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अद्य कैकेय़ि दौर्भाग्यं राज्ञा ते ख्यापितं महत् |  १७   क
आशीविषस्त्वां सङ्क्रुद्धश्चण्डो दशति दुर्भगे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति