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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
सा तद्वचनमाज्ञाय़ सर्वाभरणभूषिता |  १९   क
वेदीविलग्नमध्येव विभ्रती रूपमुत्तमम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति