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वन पर्व
अध्याय २६१
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राजो उवाच
धनं ददानि कस्याद्य ह्रिय़तां कस्य वा पुनः |  २३   क
व्राह्मणस्वादिहान्यत्र यत्किञ्चिद्वित्तमस्ति मे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति