वन पर्व  अध्याय २६१

मार्कण्डेय़ उवाच

स तद्राजा वचः श्रुत्वा विप्रिय़ं दारुणोदय़म् |  २६   क
दुःखार्तो भरतश्रेष्ठ न किञ्चिद्व्याजहार ह ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति