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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तामुवाच स धर्मात्मा नृशंसं वत ते कृतम् |  ३२   क
पतिं हत्वा कुलं चेदमुत्साद्य धनलुव्धय़ा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति