वन पर्व  अध्याय २६१

मार्कण्डेय़ उवाच

अय़शः पातय़ित्वा मे मूर्ध्नि त्वं कुलपांसने |  ३३   क
सकामा भव मे मातरित्युक्त्वा प्ररुरोद ह ||  ३३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति