वन पर्व  अध्याय २६१

मार्कण्डेय़ उवाच

ददर्श चित्रकूटस्थं स रामं सहलक्ष्मणम् |  ३७   क
तापसानामलङ्कारं धारय़न्तं धनुर्धरम् ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति