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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो रावणमभ्येत्य राक्षसी दुःखमूर्छिता |  ४५   क
पपात पादय़ोर्भ्रातुः संशुष्करुधिरानना ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति