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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तां तथा विकृतां दृष्ट्वा रावणः क्रोधमूर्छितः |  ४६   क
उत्पपातासनात्क्रुद्धो दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति