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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्वानमात्यान्विसृज्याथ विविक्ते तामुवाच सः |  ४७   क
केनास्येवं कृता भद्रे मामचिन्त्यावमन्य च ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति