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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
कः शूलं तीक्ष्णमासाद्य सर्वगात्रैर्निषेवते |  ४८   क
कः शिरस्यग्निमादाय़ विश्वस्तः स्वपते सुखम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति