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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
स निश्चित्य ततः कृत्यं स्वसारमुपसान्त्व्य च |  ५२   क
ऊर्ध्वमाचक्रमे राजा विधाय़ नगरे विधिम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति