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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिकूटं समतिक्रम्य कालपर्वतमेव च |  ५३   क
ददर्श मकरावासं गम्भीरोदं महोदधिम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति