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वन पर्व
अध्याय २६१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तमतीत्याथ गोकर्णमभ्यगच्छद्दशाननः |  ५४   क
दय़ितं स्थानमव्यग्रं शूलपाणेर्महात्मनः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति