वन पर्व  अध्याय २६१

मार्कण्डेय़ उवाच

लोहिताक्षं महावाहुं मत्तमातङ्गगामिनम् |  ९   क
दीर्घवाहुं महोरस्कं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति