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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
संहत्य धर्मं चरतां पुरासीत्सुखमेव तत् |  १०   क
तेषां नासीद्विधातव्यं प्राय़श्चित्तं कदाचन ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति