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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् |  १७   क
अशक्नुवद्भिश्चरितुं किञ्चिद्धर्मेषु सूचितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति