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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
शरीरमेतत्कुरुते यद्वेदे कुरुते तनुम् |  २   क
कृतशुद्धशरीरो हि पात्रं भवति व्राह्मणः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति